जींस के ऊपर साड़ी पहनकर एंकरिंग करती थी ये अभिनेत्री…

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दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है…, आज रपट जाए तो…, हमने सनम को ख़त लिखा… जैसे गाने बजते ही दिलों-दिमाग पर अभिनेत्री स्मिता पाटिल की तस्वीर छप जाती है। मशहूर अदाकारों और निर्देशकों के साथ काम कर चुकी स्मिता ने अपनी अदाकारी का लोहा पूरी दुनिया में मनवाया है। आज ही के दिन यानी 13 दिसंबर 1986 को महज 31 साल की उम्र में ही अभिनेत्री स्मिता पाटिल का निधन हो गया था और उनके अचानक निधन से बॉलिवुड चौंक सा गया था! आज स्मिता पाटिल की पुण्यतिथि है।

स्मिता पाटिल का जन्म 17 अक्टूबर 1956 को हुआ था और वो पर्दे पर गंभीर भूमिका निभाने के लिए जानी जाती थीं। स्मिता पर्दे पर भले ही सीरियस रोल्स में दिखती थीं, लेकिन असल जिदंगी में वे बहुत शरारती थीं। उन्हें गाड़ी चलाने का बहुत शौक था, इसलिए 14-15 साल की उम्र में ही उन्होंने चुपके से ड्राइविंग सीख ली थी। उनकी जीवनी लिखने वाली मैथिली राव की किताब (Smita Patil: A Brief Incandescence) में इसका जिक्र मिलता है।

शायद ही आपको पता हो कि स्मिता पाटिल फिल्मों में आने से पहले एक न्यूज एंकर हुआ करती थीं। स्मिता जब महज 16 साल की थीं तभी वे न्यूजरीडर की नौकरी करने लगी थीं। वे बॉम्बे दूरदर्शन में मराठी में समाचार पढ़ा करती थीं। समाचार पढ़ने के लिए स्मिता दूरदर्शन में जींस पहन कर जाया करती थीं लेकिन, जब उन्हें खबरें पढ़नी होती थीं, तो वे जींस के ऊपर से ही साड़ी लपेट लिया करतीं थीं, क्योंकि तब टीवी पर न्यूजरीडर साड़ी पहनकर ही खबरें पढ़ती थीं और उन्हें जीन्स पहनना अच्छा लगता था।
उसी दौरान उनकी मुलाकात जाने माने निर्माता-निर्देशक श्याम बेनेगल से हुई और बेनेगल ने स्मिता की प्रतिभा को पहचान कर उन्हें अपनी फिल्म ‘चरण दास चोर’ में एक छोटी सी भूमिका निभाने को कहा। वहां से स्मिता का फिल्मी सफर शुरू हो गया! अस्सी के दशक में स्मिता ने समानांतर सिनेमा के साथ व्यावसायिक सिनेमा की ओर अपना रूख कर लिया। इस दौरान उन्हें तब के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के साथ ‘नमक हलाल’ और ‘शक्ति’ में काम करने का मौका मिला। यह फिल्में कामयाब रहीं।hqdefault

आज भी जब कभी बॉलिवुड के संवेदनशील कलाकारों का जिक्र होता है तो उनमें स्मिता पाटिल का नाम बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है। स्मिता के पिता शिवाजी राय पाटिल राज्य सरकार में मंत्री थे। जबकि उनकी मां एक समाज सेविका थी।

एक दशक से भी छोटे फिल्मी सफर में स्मिता पाटिल ने अस्सी से ज्यादा हिंदी और मराठी फिल्मों में अभिनय कर अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनकी चर्चित फ़िल्मों में- ‘निशान्त’, ‘चक्र’, ‘मंथन’, ‘भूमिका’, ‘गमन’, ‘आक्रोश’, ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’, ‘अर्थ’, ‘बाज़ार’, ‘मंडी’, ‘मिर्च मसाला’, ‘अर्धसत्य’, ‘शक्ति’, ‘नमक हलाल’, ‘अनोखा रिश्ता’ आदि शामिल हैं।

व्यवस्था के बीच पिसती एक औरत के संघर्ष पर आधारित केतन मेहता की फिल्म ‘मिर्च-मसाला’ ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई। फिल्म ‘भूमिका’ और ‘चक्र’ में श्रेष्ठ अभिनय के लिए दो बार वो नेशनल अवॉर्ड्स जीत चुकी हैं। साथ ही उन्हें चार फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिले। साल 1985 में भारतीय सिनेमा में उनके अमूल्य योगदान को देखते हुये उन्हें ‘पदमश्री’ से सम्मानित किया गया।

स्मिता पाटिल शोहरत के साथ-साथ विवादों की वजह से भी वो चर्चा में रहीं। जब राज बब्बर के साथ उनकी नजदीकियां कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थीं तब मीडिया ने उनकी आलोचना करनी शुरू कर दी थी, क्योंकि राज पहले से ही शादीशुदा थे।

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स्मिता की जीवनी लिखने वाली लेखिका मैथिली राव अपनी किताब में कहती हैं, ‘स्मिता पाटिल की मां स्मिता और राज बब्बर के रिश्ते के खिलाफ थीं। वो कहती थीं कि महिलाओं के अधिकार के लिए लड़ने वाली स्मिता किसी और का घर कैसे तोड़ सकती हैं? लेकिन, राज बब्बर से अपने रिश्ते को लेकर स्मिता ने मां की भी नहीं सुनी।’

1986 में राज बब्बर और स्मिता एक हो गए। राज से स्मिता को एक बेटा भी हुआ- प्रतीक। प्रतीक के जन्म के कुछ घंटों बाद ही 13 दिसंबर 1986 को स्मिता का निधन हो गया। कहा जाता है कि राज बब्बर के साथ स्मिता का रिश्ता भी तब तक कुछ बहुत ज्यादा अच्छा नहीं रह गया था। स्मिता अपने आखिरी दिनों में बहुत अकेला महसूस करती थीं। स्मिता पाटिल की एक आखिरी इच्छा थी। उनके मेकअप आर्टिस्ट दीपक सावंत के मुताबिक, ‘स्मिता कहा करती थीं कि दीपक जब मैं मर जाउंगी तो मुझे सुहागन की तरह तैयार करना।’ मरने के बाद उनकी अंतिम इच्छा के मुताबिक, स्मिता के शव का सुहागन की तरह मेकअप किया गया।

 

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